महाभारत 2.61.3
वाहनानि धनं चैव कवचान्यायुधानि चराज्यमात्मा वयं चैव कैतवेन हृतं परैः
vāhanāni dhanaṃ caiva kavacānyāyudhāni carājyamātmā vayaṃ caiva kaitavena hṛtaṃ paraiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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