महाभारत 2.61.63
यदि वै वक्ष्यसि मृषा प्रह्लादाथ न वक्ष्यसिशतधा ते शिरो वज्री वज्रेण प्रहरिष्यति
yadi vai vakṣyasi mṛṣā prahlādātha na vakṣyasiśatadhā te śiro vajrī vajreṇa prahariṣyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें