महाभारत 2.62.6
यां न मृष्यन्ति वातेन स्पृश्यमानां पुरा गृहेस्पृश्यमानां सहन्तेऽद्य पाण्डवास्तां दुरात्मना
yāṃ na mṛṣyanti vātena spṛśyamānāṃ purā gṛhespṛśyamānāṃ sahante'dya pāṇḍavāstāṃ durātmanā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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