महाभारत 2.63.13
वृकोदरस्तदालोक्य नेत्रे उत्फाल्य लोहितेप्रोवाच राजमध्ये तं सभां विश्रावयन्निव
vṛkodarastadālokya netre utphālya lohiteprovāca rājamadhye taṃ sabhāṃ viśrāvayanniva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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