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महाभारत 2.69.20
आपृष्टोऽसीह कौन्तेय स्वस्ति प्राप्नुहि भारतकृतार्थं स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामः पुनरागतम्
āpṛṣṭo'sīha kaunteya svasti prāpnuhi bhāratakṛtārthaṃ svastimantaṃ tvāṃ drakṣyāmaḥ punarāgatam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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