महाभारत 2.71.15
असक्ताः सिकतास्तस्य यथा संप्रति भारतअसक्तं शरवर्षाणि तथा मोक्ष्यति शत्रुषु
asaktāḥ sikatāstasya yathā saṃprati bhārataasaktaṃ śaravarṣāṇi tathā mokṣyati śatruṣu
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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