महाभारत 3.10.3परित्यक्तुं न शक्नोमि दुर्योधनमचेतनम्पुत्रस्नेहेन भगवञ्जानन्नपि यतव्रतparityaktuṃ na śaknomi duryodhanamacetanamputrasnehena bhagavañjānannapi yatavrataइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें