महाभारत 3.101.2
लोका ह्येवं वर्तयन्ति अन्योन्यं समुपाश्रिताःत्वत्प्रसादान्निरुद्विग्नास्त्वयैव परिरक्षिताः
lokā hyevaṃ vartayanti anyonyaṃ samupāśritāḥtvatprasādānnirudvignāstvayaiva parirakṣitāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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