महाभारत 3.101.8
ते वृत्रं निहतं दृष्ट्वा सहस्राक्षेण धीमताजीवितं परिरक्षन्तः प्रविष्टा वरुणालयम्
te vṛtraṃ nihataṃ dṛṣṭvā sahasrākṣeṇa dhīmatājīvitaṃ parirakṣantaḥ praviṣṭā varuṇālayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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