महाभारत 3.104.13
तं प्रीतिमान्हरः प्राह सभार्यं नृपसत्तमम्यस्मिन्वृतो मुहूर्तेऽहं त्वयेह नृपते वरम्
taṃ prītimānharaḥ prāha sabhāryaṃ nṛpasattamamyasminvṛto muhūrte'haṃ tvayeha nṛpate varam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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