महाभारत 3.105.21असुरोरगरक्षांसि सत्त्वानि विविधानि चआर्तनादमकुर्वन्त वध्यमानानि सागरैःasuroragarakṣāṃsi sattvāni vividhāni caārtanādamakurvanta vadhyamānāni sāgaraiḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें