महाभारत 3.108.2
धारयिष्ये महाबाहो गगनात्प्रच्युतां शिवाम्दिव्यां देवनदीं पुण्यां त्वत्कृते नृपसत्तम
dhārayiṣye mahābāho gaganātpracyutāṃ śivāmdivyāṃ devanadīṃ puṇyāṃ tvatkṛte nṛpasattama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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