महाभारत 3.110.32ता राजभयभीताश्च शापभीताश्च योषितःअशक्यमूचुस्तत्कार्यं विवर्णा गतचेतसःtā rājabhayabhītāśca śāpabhītāśca yoṣitaḥaśakyamūcustatkāryaṃ vivarṇā gatacetasaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें