महाभारत 3.114.12
इमां गाथामत्र गायन्नपः स्पृशति यो नरःदेवयानस्तस्य पन्थाश्चक्षुश्चैव प्रकाशते
imāṃ gāthāmatra gāyannapaḥ spṛśati yo naraḥdevayānastasya panthāścakṣuścaiva prakāśate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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