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महाभारत 3.115.5
अकृतव्रण उवाच · akṛtavraṇa uvāca
आयानेवासि विदितो रामस्य विदितात्मनःप्रीतिस्त्वयि च रामस्य क्षिप्रं त्वां दर्शयिष्यति
āyānevāsi vidito rāmasya viditātmanaḥprītistvayi ca rāmasya kṣipraṃ tvāṃ darśayiṣyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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