महाभारत 3.116.2
स प्रसेनजितं राजन्नधिगम्य नराधिपम्रेणुकां वरयामास स च तस्मै ददौ नृपः
sa prasenajitaṃ rājannadhigamya narādhipamreṇukāṃ varayāmāsa sa ca tasmai dadau nṛpaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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