महाभारत 3.12.5तद्वनं तापसा नित्यं शेषाश्च वनचारिणःदूरात्परिहरन्ति स्म पुरुषादभयात्किलtadvanaṃ tāpasā nityaṃ śeṣāśca vanacāriṇaḥdūrātpariharanti sma puruṣādabhayātkilaइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें