महाभारत 3.122.26
सुकन्यापि पतिं लब्ध्वा तपस्विनमनिन्दितानित्यं पर्यचरत्प्रीत्या तपसा नियमेन च
sukanyāpi patiṃ labdhvā tapasvinamaninditānityaṃ paryacaratprītyā tapasā niyamena ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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