महाभारत 3.13.44
विष्णुस्त्वमसि दुर्धर्ष त्वं यज्ञो मधुसूदनयष्टा त्वमसि यष्टव्यो जामदग्न्यो यथाब्रवीत्
viṣṇustvamasi durdharṣa tvaṃ yajño madhusūdanayaṣṭā tvamasi yaṣṭavyo jāmadagnyo yathābravīt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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