महाभारत 3.139.5
जघन्यरात्रे निद्रान्धः सावशेषे तमस्यपिचरन्तं गहनेऽरण्ये मेने स पितरं मृगम्
jaghanyarātre nidrāndhaḥ sāvaśeṣe tamasyapicarantaṃ gahane'raṇye mene sa pitaraṃ mṛgam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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