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महाभारत 3.147.21
प्रणिपत्य च कौन्तेयः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्प्रसीद कपिशार्दूल दुरुक्तं क्षम्यतां मम
praṇipatya ca kaunteyaḥ prāñjalirvākyamabravītprasīda kapiśārdūla duruktaṃ kṣamyatāṃ mama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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