महाभारत 3.148.4
एवं तुष्टो भविष्यामि श्रद्धास्यामि च ते वचःएवमुक्तः स तेजस्वी प्रहस्य हरिरब्रवीत्
evaṃ tuṣṭo bhaviṣyāmi śraddhāsyāmi ca te vacaḥevamuktaḥ sa tejasvī prahasya harirabravīt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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