महाभारत 3.150.17
अनुस्मरन्वपुस्तस्य श्रियं चाप्रतिमां भुविमाहात्म्यमनुभावं च स्मरन्दाशरथेर्ययौ
anusmaranvapustasya śriyaṃ cāpratimāṃ bhuvimāhātmyamanubhāvaṃ ca smarandāśaratheryayau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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