महाभारत 3.153.2
ततो वायुर्महाञ्शीघ्रो नीचैः शर्करकर्षणःप्रादुरासीत्खरस्पर्शः संग्राममभिचोदयन्
tato vāyurmahāñśīghro nīcaiḥ śarkarakarṣaṇaḥprādurāsītkharasparśaḥ saṃgrāmamabhicodayan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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