महाभारत 3.155.32ते मृगद्विजसंघुष्टं नानाद्विजसमाकुलम्शाखामृगगणैश्चैव सेवितं सुमनोहरम्te mṛgadvijasaṃghuṣṭaṃ nānādvijasamākulamśākhāmṛgagaṇaiścaiva sevitaṃ sumanoharamइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें