महाभारत 3.155.59तथैव वनराजीनामुदारान्रचितानिवविराजमानांस्तेऽपश्यंस्तिलकांस्तिलकानिवtathaiva vanarājīnāmudārānracitānivavirājamānāṃste'paśyaṃstilakāṃstilakānivaइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें