महाभारत 3.157.38
रत्नजालपरिक्षिप्तं चित्रमाल्यधरं शिवम्राक्षसाधिपतेः स्थानं ददर्श भरतर्षभः
ratnajālaparikṣiptaṃ citramālyadharaṃ śivamrākṣasādhipateḥ sthānaṃ dadarśa bharatarṣabhaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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