महाभारत 3.159.3
धृतिमान्देशकालज्ञः सर्वधर्मविधानवित्क्षत्रियः क्षत्रियश्रेष्ठ पृथिवीमनुशास्ति वै
dhṛtimāndeśakālajñaḥ sarvadharmavidhānavitkṣatriyaḥ kṣatriyaśreṣṭha pṛthivīmanuśāsti vai
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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