महाभारत 3.16.8सभुशुण्ड्यश्मलगुडा सायुधा सपरश्वधालोहचर्मवती चापि साग्निः सहुडशृङ्गिकाsabhuśuṇḍyaśmalaguḍā sāyudhā saparaśvadhālohacarmavatī cāpi sāgniḥ sahuḍaśṛṅgikāइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें