महाभारत 3.160.25
अस्तं प्राप्य ततः संध्यामतिक्रम्य दिवाकरःउदीचीं भजते काष्ठां दिशमेष विभावसुः
astaṃ prāpya tataḥ saṃdhyāmatikramya divākaraḥudīcīṃ bhajate kāṣṭhāṃ diśameṣa vibhāvasuḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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