महाभारत 3.160.5
इन्द्रवैश्रवणावेतां दिशं पाण्डव रक्षतःपर्वतैश्च वनान्तैश्च काननैश्चोपशोभिताम्
indravaiśravaṇāvetāṃ diśaṃ pāṇḍava rakṣataḥparvataiśca vanāntaiśca kānanaiścopaśobhitām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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