महाभारत 3.162.8
धनंजयश्च तेजस्वी प्रणिपत्य पुरंदरम्भृत्यवत्प्रणतस्तस्थौ देवराजसमीपतः
dhanaṃjayaśca tejasvī praṇipatya puraṃdarambhṛtyavatpraṇatastasthau devarājasamīpataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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