महाभारत 3.164.16
सुरकार्यार्थसिद्ध्यर्थं दृष्टवानसि शंकरम्अस्मत्तोऽपि गृहाण त्वमस्त्राणीति समन्ततः
surakāryārthasiddhyarthaṃ dṛṣṭavānasi śaṃkaramasmatto'pi gṛhāṇa tvamastrāṇīti samantataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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