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महाभारत 3.164.49
ततोऽपश्यं वसून्रुद्रान्साध्यांश्च समरुद्गणान्आदित्यानश्विनौ चैव तान्सर्वान्प्रत्यपूजयम्
tato'paśyaṃ vasūnrudrānsādhyāṃśca samarudgaṇānādityānaśvinau caiva tānsarvānpratyapūjayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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