महाभारत 3.167.14
एवं मे चरतस्तत्र सर्वयत्नेन शत्रुहन्प्रीतिमानभवद्वीरो मातलिः शक्रसारथिः
evaṃ me caratastatra sarvayatnena śatruhanprītimānabhavadvīro mātaliḥ śakrasārathiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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