महाभारत 3.168.7
धारा दिवि च संबद्धा वसुधायां च सर्वशःव्यामोहयन्त मां तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि
dhārā divi ca saṃbaddhā vasudhāyāṃ ca sarvaśaḥvyāmohayanta māṃ tatra nipatantyo'niśaṃ bhuvi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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