महाभारत 3.17.4
अनीकानां विभागेन पन्थानः षट्कृताभवन्प्रवणा नव चैवासञ्शाल्वस्य शिबिरे नृप
anīkānāṃ vibhāgena panthānaḥ ṣaṭkṛtābhavanpravaṇā nava caivāsañśālvasya śibire nṛpa
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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