महाभारत 3.170.50
गाण्डीवास्त्रप्रणुन्नांस्तान्गतासून्नभसश्च्युतान्दृष्ट्वाहं प्राणमं भूयस्त्रिपुरघ्नाय वेधसे
gāṇḍīvāstrapraṇunnāṃstāngatāsūnnabhasaścyutāndṛṣṭvāhaṃ prāṇamaṃ bhūyastripuraghnāya vedhase
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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