महाभारत 3.174.17
वराहनानामृगपक्षिजुष्टं; महद्वनं चैत्ररथप्रकाशम्शिवेन यात्वा मृगयाप्रधानाः; संवत्सरं तत्र वने विजह्रुः
varāhanānāmṛgapakṣijuṣṭaṃ; mahadvanaṃ caitrarathaprakāśamśivena yātvā mṛgayāpradhānāḥ; saṃvatsaraṃ tatra vane vijahruḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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