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महाभारत 3.176.12
इमामवस्थां संप्राप्तो ह्यहं कोपान्मनीषिणाम्शापस्यान्तं परिप्रेप्सुः सर्पस्य कथयामि तत्
imāmavasthāṃ saṃprāpto hyahaṃ kopānmanīṣiṇāmśāpasyāntaṃ pariprepsuḥ sarpasya kathayāmi tat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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