महाभारत 3.177.26
युधिष्ठिर उवाच · yudhiṣṭhira uvāca
जातिरत्र महासर्प मनुष्यत्वे महामतेसंकरात्सर्ववर्णानां दुष्परीक्ष्येति मे मतिः
jātiratra mahāsarpa manuṣyatve mahāmatesaṃkarātsarvavarṇānāṃ duṣparīkṣyeti me matiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें