महाभारत 3.178.33
अहं हि दिवि दिव्येन विमानेन चरन्पुराअभिमानेन मत्तः सन्कंचिन्नान्यमचिन्तयम्
ahaṃ hi divi divyena vimānena caranpurāabhimānena mattaḥ sankaṃcinnānyamacintayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें