महाभारत 3.183.7
किं त्वस्ति तत्र द्वेष्टारो निवसन्ति हि मे द्विजाःयथा मे गौतमः प्राह ततो न व्यवसाम्यहम्
kiṃ tvasti tatra dveṣṭāro nivasanti hi me dvijāḥyathā me gautamaḥ prāha tato na vyavasāmyaham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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