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महाभारत 3.184.12
तार्क्ष्य उवाच · tārkṣya uvāca
किमग्निहोत्रस्य व्रतं पुराण;माचक्ष्व मे पृच्छतश्चारुरूपेत्वयानुशिष्टोऽहमिहाद्य विद्यां; यदग्निहोत्रस्य व्रतं पुराणम्
kimagnihotrasya vrataṃ purāṇa;mācakṣva me pṛcchataścārurūpetvayānuśiṣṭo'hamihādya vidyāṃ; yadagnihotrasya vrataṃ purāṇam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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