महाभारत 3.185.11
उदकान्तमुपानीय मत्स्यं वैवस्वतो मनुःअलिञ्जरे प्राक्षिपत्स चन्द्रांशुसदृशप्रभम्
udakāntamupānīya matsyaṃ vaivasvato manuḥaliñjare prākṣipatsa candrāṃśusadṛśaprabham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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