महाभारत 3.185.33
एवं करिष्य इति तं स मत्स्यं प्रत्यभाषतजग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम्
evaṃ kariṣya iti taṃ sa matsyaṃ pratyabhāṣatajagmatuśca yathākāmamanujñāpya parasparam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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