महाभारत 3.185.7
भगवन्क्षुद्रमत्स्योऽस्मि बलवद्भ्यो भयं मममत्स्येभ्यो हि ततो मां त्वं त्रातुमर्हसि सुव्रत
bhagavankṣudramatsyo'smi balavadbhyo bhayaṃ mamamatsyebhyo hi tato māṃ tvaṃ trātumarhasi suvrata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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