महाभारत 3.186.102
निषधं चापि पश्यामि श्वेतं च रजताचितम्पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम्
niṣadhaṃ cāpi paśyāmi śvetaṃ ca rajatācitampaśyāmi ca mahīpāla parvataṃ gandhamādanam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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