Loading
महाभारत 3.186.104
महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम्मलयं चापि पश्यामि पारियात्रं च पर्वतम्
mahendraṃ caiva paśyāmi vindhyaṃ ca girimuttamammalayaṃ cāpi paśyāmi pāriyātraṃ ca parvatam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें