महाभारत 3.186.113
ततोऽहं सहसा राजन्वायुवेगेन निःसृतःमहात्मनो मुखात्तस्य विवृतात्पुरुषोत्तम
tato'haṃ sahasā rājanvāyuvegena niḥsṛtaḥmahātmano mukhāttasya vivṛtātpuruṣottama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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